राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी, भारतराष्ट्रीय न्यायिक अकादमी, भारत, Logo
परिकल्पना विवरण संस्था अध्यक्ष रा. न्या. अ. को मार्गदर्शन देने वाले उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश रा. न्या. अ. के प्रबंध मंडलों के सदस्य निदेशक अपर निदेशक (अतिरिक्त निदेशक) रजिस्ट्रार (पंजीयक) संकाय प्रशासन रा. न्या. अ. का चार्टर वार्षिक प्रतिवेदन
चर्चा का स्थान प्रश्न NJA's Programmes Home Page वेब स्ट्रीमिंग निर्णय पर
रा. न्या. अ. के कार्यक्रम राज्य न्या. अ. के कार्यक्रम राष्ट्रीय न्यायिक शिक्षा रणनीति सम्मेलन वीडियो
उच्चतम न्यायालय के मामले साइट्स जिनका उपयोग आप कर सकते हैं ज्ञान साझा करना
शोध प्रकाशन / पत्रिकाएँ पठन सामग्री
एन.जे.ए. घोषणापत्र

संस्था का अनुबन्ध पत्र एवं नियमावली

राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी


पंजीकृत कार्यालय :
भारत का सर्वोच्च न्यायालय,
तिलक मार्ग,
नई दिल्ली - 110 001

प्रस्थित :
भदभदा रोड,
सूरज नगर,
भोपाल 462044

राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी संस्था का अनुबंधक

1. नाम
संस्था का नाम राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी है।

2. पंजीकृत कार्यालय :
संस्था का कार्यालय दिल्ली की राष्ट्रीय राजधानी टेरिटोरी में होगा और वर्तमान में यह निम्नलिखित पते पर हैः
कक्ष क्र. 7, प्रथमतल,
पश्चिम विंग (खण्ड),
भारत का सर्वोच्च न्यायालय,
तिलक मार्ग,
नई दिल्ली - 110 001.

3. ध्येय :
संस्था जिन उद्देष्यों और ध्येयों के लिए निर्मित की गई है वे हैः

(i) राज्यों/संघ प्रदेशों के न्यायिक अधिकारियों के प्रषिक्षण प्रदान करना।
(ii) भारत के सर्वोच्च न्याययाल में कार्यरत् कार्यालयीन अधिकारियों को प्रषिक्षण की सुविधा प्रदान करना।
(iii) राज्यों और संघ प्रदेशों के न्यायायलय प्रबन्धन और न्यायाधिकारी के प्रषासन का अध्ययन करना और कथित प्रणाली को सुधार सुझाना
(iv) संस्था के प्रबंधन एवं प्रषासन के लिए नियमावली निर्धारित करना,
(v) न्यायालय प्रबंधन एवं न्यायाधिकारी के प्रषासन से संबंधित मामलों में अध्ययन पाठ्यक्रमों, सम्मेलनों, सेमिनार और व्याख्यान और शोध को समझना, आयोजन करना और उन्हें सुविधा देना,
(vi) संस्था को न्यायालय प्रबंधन में उत्कृष्ट केन्द्र के रूप में स्थापित करना,
(vii) न्यायिक प्रषासन से संबंधित सूचना और साहित्य को क्पेमउपदंजम करना और प्रदान करना,
(viii) न्यायालय के पहलुओं और केस फ्लो प्रबंधन तथा न्यायालय तकनीक (संगठक) के व्यवहार करने वाले न्यायिक अधिकारियों और न्यायालय प्रषासकों के लिए प्रषिक्षण कार्यक्रम संचालित करना अथवा प्रायोजित करना,
(ix) राज्यों/संघ प्रदेशों के न्यायिक अधिकारियों के लिए सतत् न्यायिक षिक्षा प्रदान करना,
(x) व्यावसायिक स्पर्धा और अभ्यास के सबसे ऊँचे मानदण्ड को प्रोत्साहित करने हेतु लक्षित कार्यक्रमों को सहायता देना और षिक्षा तथा कौषल को बढ़ावा देना,
(xi) संस्था के लक्ष्य के बढ़ावा देने हेतु भारत में सुविधाजनक स्थानों पर क्षेत्रीय केन्द्र स्थापित करना,
(xii) न्याय के प्रषासन की खातिर सहायता करने के उद्देष्य से शोध संस्थानों विष्वविद्यालयों और अन्य निकायों के साथ सम्पर्क (मेल) स्थापित करना,
(xiii) अपनी प्रषिक्षण गुणवत्ता सुधारने के लिए राज्य/संघ प्रदेशों के न्यायिक अधिकारियों के लिए निवर्तमान प्रषिक्षण केन्द्रों की सामर्थ्य को बढ़ाना,
(xiv) देष में और विदेष दोनों में अन्य संस्थाओं और निकायों के साथ न्यायालय प्रबंधन के अध्ययन को प्रोत्साहित करने में सहायता देना, अन्तः किया करना और सहयोग करना,
(xv) न्यायालय प्रबन्धन और न्यायिक अधिकारी के प्रषासन में पत्रों, पुस्तकों, मोनोग्राफ जर्नल इत्यादि के प्रकाषन को हाथ में लेना
(xvi) शोध परिणामों और अन्य प्रषिक्षण पाठ्यक्रमो/कार्यक्रमों से संबंधित सूचनाओं को प्रकाषित करना और कपेमउपदंजम करना,
(xvii) प्रशिक्षित न्यायिक अधिकारियों को प्रमाण पत्र और अन्य विषेष योग्यता प्रदान करना और ऐसे प्रमाण पत्र तथा अन्य विषेष योग्यता प्रदान करने के पूर्व दक्षता के मापदण्ड निर्धारित करना,
(xviii) संस्था के सुचारू संचालन के लिए कार्यविधि स्थापित करना और कार्मिक, वित, प्रषासन, क्रय तथा छात्रावासों के प्रबंधन से संबंधित मामलों में गतिविधियों को चलाना,
(xix) ऐसे अन्य सब कानूनी कार्य और चीजें करना जो संस्था के लक्ष्यों की उपलब्धि में संवाहक अथवा आनुषंगिक है।

4. उपर्युक्त बातों की सामान्यता से पक्षपात किए बिना और उपर्युक्त उद्देष्यों के क्रियान्वयन के बिना संस्था को अधिकार होगा कि वह प्रतिभूतियों और छमहवजपंइसम पदेजतनउमदज के साथ-साथ किसी भी प्रकार की सम्पत्ति को अधिग्रहण, प्राप्ति और कब्जा कर सकती है, भवन के निर्माण करने और रखरखाव करने हेतु साथ ही उन्हे उपर्युक्त रूप से बदलने का अधिकार रखेगी ताकि उसका प्रबंधन, विक्रय, स्थानान्तर अथवा अन्यथा संस्था को किसी भी प्रकार सम्पत्ति के साथ व्यवहार कर सकेगी, और संस्था के किसी भी उद्देष्य के संबंध में अनुबंध कर सकेगी, राषि और विधि जैसा भी उचित होगा संस्था के लिए और संस्था की और से बना सकेगी। संस्था के कर्मचारियों के हितार्थ यदि और जब आवष्यक समझा जाएगा भविष्यनिधि स्थापित कर सकेगी, और जिस किसी व्यास, निधि अथवा धर्मस्व को संस्था उचित समझेगी उसका प्रबंधन स्वीकार कर सकेगी।

5. संस्था की सभी आय, अर्जन, चल-अचल सम्पत्तियां, उसके ध्येय एवं उद्देष्य मात्र के लिए पूर्ण रूपेण उपयोग और आवेदित की जाएगी जैसा की संस्था के अनुबंध (मेमोरेण्डम) में सुनिष्चित है और उसका कोई मिलाप डिविडेंड बोनस लाभ या अन्य न प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से न दिया जाएगा न हस्तांरित होगा। संस्था के वर्तमान अथवा पूर्व सदस्यों जो कुछ भी हो को संस्था के किसी भ सदस्य उसकी सहायता के नाते का संस्था की किसी दल अचल सम्पत्ति पर कोई व्यक्तिगत दावा नहीं होगा अथवा कोई लाभ जो कुछ ही नहीं लेगा।
6. शासकीय निकाय
शासकीय निकाय के जिन निर्वतमान सदस्यों को संस्था के प्रबंधन का जैसा कि सोसाइटी रजिस्ट्रेषन अधिनियम 1860 के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत अभी है जैसा कि राष्ट्रीय राजधानी समझनी प्रदेष दिल्ली के लिए लागू है भार सौंपा गया है, उनके नाम, पते, व्यवसाय और पदनाम निम्नलिखित हैः
क्र. पूरा नाम पता व्यवसाय पदनाम
  1. माननीय न्यायाधीष श्री एम.एन.वेंकट चलैया भारत के मुख्य न्यायाधीष
  2. माननीय न्यायाधीष श्री एस. रत्नावेल पांडियन न्यायाधीन भारत का सर्वोच्च न्यायालय
  3. माननीय न्यायाधीष श्री एस.सी. अग्रवाल न्यायाधीन भारत का सर्वोच्च न्यायालय.
  4. श्री एन एन वोहरा सचिव भारत सरकार न्याय विभाग
  5. श्री पी.सी. राव सचिव भारत सरकार विधिक मामलों का विभाग
  6. श्री के.वेंकटेषन सचिव भारत सरकार व्यय विभाग
  7. श्री एम.एस.ए सिद्दीकी महापंजीयक भारत का सर्वोच्च न्यायालय नई दिल्ली
7. इच्छुक व्यक्ति:
हम अधोहस्ताक्षित जैसा की सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम 1860 के अन्तर्गत राष्ट्रीय राजधानी प्रदेष दिल्ली के लिए लागू है राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी नाम संस्था के नियमावली का पालन करते हुए बनाने के इच्छुक है।


S.No. Name & Address Occupation Signature Attestation
1. एम.एन. वेंकट चलैया
5 कृष्ण मेनन मार्ग,
नई दिल्ली
भारत के मुख्य न्यायाधीश  
2. एस.रत्नावेल पांडियन
10, तीस जनवरी मार्ग,
नई दिल्ली
न्यायाधीश, भारत का सर्वोच्च न्यायायल  
3. एस.सी. अग्रवाल
17, सफदरगंज रोड,
नई दिल्ली
न्यायाधीश, भारत का सर्वोच्च न्यायायल  
4. एन.एन. वोहरा

सचिव,

गृह एवं न्याय विभाग भारत सरकार
 
5. पी. चन्द्रशेखर राव

सचिव,
विधिक मामलों का विभाग

भारत सरकार
 
6. के. वेंकटेषन

सचिव,

व्यय विभाग, वित्त मंत्रालय
 
7. एम.एस.ए. सिद्दीकी
सी/4, पंडारा पार्क,
नई दिल्ली
महा पंजीयक
भारत का सर्वोच्च न्यायायल
क्रमांक 1 से 7 तक उल्लेखित व्यक्तियों के हस्ताक्षर सत्यापित किए गए हस्ता./-
ए.पी.जैन
संयुक्त पंजीयक
भारत का सर्वोच्च न्यायालय

राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी ’’नियम एवं विनियम’’

1. संक्षिप्त नाम :
  1. ये नियम और विनियम नियमावली ‘‘राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी नियमावली’’ कहे जा सकते हैं;
  2. ये सोसाइटीज पंजीयन अधिनियम 1860 के अन्तर्गत संस्था के पंजीयन की तिथि से लागू होंगे।
2. परिभाषाएँ :
इन नियमों में जब तक कि सन्दर्भ अन्यथा नहीं हो : -
  1. ‘संस्था’ क अर्थ है राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी
  2. शासकीय कौंसिल (परिषद) का अर्थ है- संस्था की शासकीय परिषद
  3. ‘साधारण निकाय’ का अर्थ है- संस्था के सदस्यों की सहायता सभा।
  4. अध्यक्ष का अर्थ है- संस्था का और शासकीय निकाय का अध्यक्ष।
  5. निदेशक का अर्थ है - संस्था के निदेशक के रूप में नियुक्त व्यक्ति।
  6. सदस्य का अर्थ है - संस्था के सदस्य जिन्हें संस्था के नियमानुसार संस्था में प्रवेष दिया गया और जिनके नाम सदस्य पंजी में दर्ज है।
  7. ‘अकादमीय कर्मचारी वर्ग’ का अर्थ है- शिक्षा, प्रशिक्षण अथवा शोध में कार्यरत संस्था के कर्मचारी
  8. ‘नियम’ का अर्थ है - संस्था द्वारा समय-समय पर संशोधित किए गए राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी के नियम।
  9. ‘ज्ञापन’ का अर्थ है - संस्था का ज्ञापन जैसा कि संस्था पंजीकरण अधिनियम 1860 के अंतर्गत पंजीकृत है और जैसा कि संस्था द्वारा समय समय पर संशोधित किए गए है।
  10. ‘कार्यालयीन वर्ष’ का अर्थ है- वित्त वर्ष अर्थात् 1 अप्रैल से 31 मार्च।
3. संस्था के सदस्य :
संस्था की सदस्यता निम्नलिखित तक सीमित होगी :
  1. मुख्य न्यायाधीश, भारत (पदेन अध्यक्ष);
  2. दो अवर न्यायाधीश, सर्वोच्य न्यायालय भारत;
  3. एक उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश;
  4. अन्य उच्च न्यायालय का एक न्यायाधीश;
  5. दो विधि अकादमियन;
    और निम्नलिखित पदेन सदस्य;
    (v-a) * विधि मंत्री भारत सरकार
    (v-b) * अध्यक्ष- अभिभावक परिषद, भारत
  6. सचिव विधि एवं न्याय विभाग, भारत सरकार
  7. सचिव कानूनी मामलों का विभाग, भारत सरकार
  8. सचिव कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग, भारत सरकार
  9. सचिव न्यायविभाग, भारत सरकार
  10. ** महासचिव सर्वोच्य न्यायालय भारत
  11. ** निदेशक राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी, संस्था का पदेन सचिव
4. सदस्यता की शर्तें :
  1. पदेन सदस्यों के अतिरिक्त संस्था के सदस्य, संस्था के अध्यक्ष द्वारा नामित किए जाएँगे और उनका कार्यकाल तीन वर्ष का अथवा उनका संबंधित कार्यकाल जो भी कम हो।
  2. यदि तीन वर्ष की अवधि में कोई आकस्मिक रिक्तता होती है तो ऐसी रिक्तता मूल रिक्तता की भांति पूर्ति की जायेगी और वह प्रविष्ट सदस्य उस शेष अवधि के लिए होगा।
5. पदेन सदस्यता की समाप्ति :
जहाँ कोई व्यक्ति अपने कार्यालय अथवा नियुक्ति जिस पर वह नियुक्त है, संस्था का सदस्य बनता है तो उसकी संस्था की सदस्यता उसे कार्यालय या नियुक्ति की समाप्ति के साथ समाप्त हो जाऐगी।
6. त्यागपत्र
जब कोई सदस्य संस्था की सदस्यता से त्यागपत्र देना चाहता है तो वह अध्यक्ष को अपना त्याग पत्र अग्रेषित करेगा। त्याग पत्र अध्यक्ष द्वारा स्वीकारकि्त की तिथि से प्रभावी होगा।
7. सदस्यों की पंजी :
संस्था सदस्यता की पंजी संधारित करेगी जिसमें प्रत्येक सदस्य का पूरा नाम, पता, व्यवसाय दर्शाया जाएगा और प्रत्येक सदस्य उसमें हस्ताक्षर करेगा। यदि संस्था का कोई सदस्य अपना पता बदलता है तो वह अपना नया पता निदेशक को सूचित करेगा जो सदस्यता पंजी में पता परिवर्तन करेगा।
8. साधारण सभा :
  1. संस्था के सदस्यों द्वारा एक साधारण सभा गठित की जाएगी।
  2. साधारण सभा की शक्तिया, कर्त्तव्य और कार्य : -
    • संस्था के वित्तीय प्राधिकार साधारण सभा में निहित होंगे।
    • साधारण सभा की शक्तियाँ और अधिकार होंगे :
      • संस्था के नियम एवं विनियम को ग्रहण करना/पालन करना और उसे समय-समय पर संशोधन करना;
      • वार्षिक साधारण सभा की बैठक में लेखा-जोखा पारित करना और लेखा परीक्षक की रिपोर्ट और वार्षिक रिपोर्ट पर विचार करना;
      • आगामी वर्षों के लिए संस्था की गतिविधयों का कार्यक्रम अनुमोदित करना;
      • संस्था को बन्द करने और उसकी परिसम्पत्तियों और दायित्वों को राष्ट्रीय राजधानी प्रदेश दिल्ली के लिए लागू सोसाइटीज पंजीयन अधिनियम 1860 के प्रावधानों के अनुसार निपटारा करने के विषय में विचार करना और निर्णय लेना।
9. * संस्था की वार्षिक साधारण सभा की बैठक ऐसी तिथि, समय और स्थान में होगी जैसा अध्यक्ष निश्चित करेगा। पहली वार्षिक साधारण सभा की बैठक संस्था के पंजीयन के 15 महिनों बाद होगी और उसके पश्चात् आगामी वार्षिक साधारण सभा की बैठकें ऐसे अन्तराल पर होगी लेकिन वे वित्त वर्ष के समापन के चार माह के बाद नहीं होगी (i) चालू वित्त वर्ष के लिए वार्षिक और पूरक बजट पर (ii) संस्था की विगत वर्ष की वार्षिक रिपोर्ट और लेखा और बैलेंश शीट (iii) समीक्षा की जा रहे वर्ष की आडिटर की रिपोर्ट तथा (iv) अध्यक्ष की अनुमति से अन्य किसी विषय पर विचार करना।
10. बैठक आमंत्रित करने की प्रक्रिया:
  1. वार्षिक साधारण बैठक सहित साधारण सभा की बैठकें 15 दिन पूर्व निदेशक के हस्ताक्षर से लिखित सूचना पर बुलाई जायेगी।
  2. साधारण सभा की बैठक की प्रत्येक सूचना में बैठक की तिथि, समय और स्थान दर्शाया जाएगा और उसमें कार्यवाही विचार बिन्दु (एजेंडा) भी निहित होंगें। सूचना संस्था के प्रत्येक सदस्य को दी जाएगी अथवा डाक द्वारा भेजी जायेगी। यह सूचना देने या नहीं मिलने या विलम्ब से मिलने में कोई भी असावधानी पूर्वक भूल से बैठकें अवैध नहीं होंगी।
  3. संस्था के दो तिहाई सदस्यों की संख्या से साधारण सभा की बैठक की गणपूर्ति (कोरम) होगी।
यदि गणपूर्ति (कोरम) के अभाव में बैठक स्थगित की जाती है तो आगामी बैठक उसी विचार बिन्दु (एजेंडा) पर विचार करने के लिए उपस्थित सदस्यों से गणपूर्ति मानी जाएगी।
11. विशेष आमंत्रित महानुभावः
अध्यक्ष साधारण सभा की बैठक में सदस्यों के अतिरिक्त अन्य व्यक्ति को आमंत्रित कर सकता है पर ऐसे आमंत्रित व्यक्ति को बैठक में अपना मत देने की पात्रता नहीं होगी।
12. बहुमत द्वारा निर्णय :
  1. एजेंडा के किसी बिन्दु पर यदि मतभेद होता है तो वह बैठक में सदस्यों के बहुमत से निर्णय किया जाएगा।
  2. प्रत्येक सदस्य का एक मत होगा।
  3. बराबर मतों की स्थिति में बैंठक अध्यक्ष अपना निर्णायक मत देगा।
13. अध्यक्ष की समितियाँ और उपसमितियाँ गठित करने की शक्तियाँ :
संस्था के उद्देश्यों और लक्ष्यों की बेहतर पूर्ति करने के लिए अध्यक्ष को समितियाँ गठित करने का अधिकार होगा। ये समितियाँ जाँच करेंगी और उन्हें दिए गए मामलों में अध्यक्ष को सलाह देगी। उक्त समिति की रिपोर्ट और सिफारिशें, यदि कोई हों, तो शासी कौसिल को विचारार्थ प्रस्तुत की जाएंगी।
14. विशेष बैठकें :
कम से कम दो तिहाई सदस्यों द्वारा विशेष प्रकृति के मामलों पर विचार करने के लिए उचित सूचना और/अथवा लिखित सूचना पर अध्यक्ष साधारण सभा की बैठक बुला सकता है। बैठक बुलाने के इच्छुक सदस्य निदेशक को लिखित में सूचित करते हुए यह प्रार्थना कर सकते हैं कि विशेष प्रकृति के मामलों पर विचार करने के लिए बैठक बुलाई जाए और निदेशक अध्यक्ष के अनुमोदन से ऐसी बैठक के लिए सदस्यों को सूचना भेजेगा और बैठक बुलाएगा।
15. कौंसिल (प्रबंध कौंसिल) :
संस्था के प्रशासन, प्रबन्धन, और नियंत्रण प्रबंध कौंसिल में निहित होंगे जिसमें निम्नलिखित सम्मिलित होंगे:
1. भारत के मुख्य न्यायाधीश - अध्यक्ष
2. सर्वोच्य न्यायालय भारत के सदस्य न्यायाधीश - सदस्य
3. सचिव न्याय विभाग, विधि, न्याया एवं कम्पनी मामलों का मंत्रालय, भारत सरकार - सदस्य
4. सचिव विधिक मामलों का विभाग विधि, न्याया एवं कम्पनी मामलों का मंखलय भारत सरकार - सदस्य
5. सचिव न्यायविभाग, वित्त मंत्रालय भारत सरकार - सदस्य
6. महासचिव सर्वोच्य न्यायालय भारत - सदस्य
7. निदेशक, राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी - सदस्य संयोजक
16. प्रबंध कौंसिल की शक्तियाँ और कार्य :
  1. प्रबन्ध कौंसिल इसके लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए बनाएं इन नियमों और उपनियमों के अनुसार संस्था के मामलों के प्रबन्धन और प्रशासन के लिए जिम्मेदार होगी और इसके पास वे सभी शक्तियाँ होंगी जो उद्देश्य के लिए आवश्यक और लाभकारी हैं।
  2. पूर्व कथित उप नियम द्वारा प्रदत्त शक्तियों की व्यापकता से भेदभाव किए बिना प्रबंध कौंसिल के पास निम्नलिखत शक्तियाँ होंगी;
    • • संस्था के लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए विस्तृत योजना एवं कार्यक्रम तैयार करना और संचालन करना;
    • • साधारण सभा को प्रस्तुत किए जाने वाले वार्षिक एवं पूरक बजट पर विचार करना और उन्हें आवश्यक संशोधनों के साथ जो साधारण सभा को प्रस्तुत किए जा रहे है , पारित करना;
    • • संस्था की वार्षिक रिपोर्ट और लेखे साधारण सभा के विचारार्थ तैयार करना;
    • ऐसे पद सृजन करना और स्टाफ नियुक्त करना जो संस्था के मामलों के कुशल प्रबंधन के लिए आवश्यक हैं और भरती और सेवा शर्तों को नियमित करना। बशर्ते कि
      • उन पदों के सृजन के लिए जिसका अधिकतम समय वेतनमान रू. 5700/- (पुनरावृत्त रू. 18300/-) है, या अधिक है, वे भारत सरकार के अनुमोदन की आवश्यकता होगी।
      • उस पद नियुक्ति जिसका अधिकतम समय वेतनमान 22400/- रू. अथवा अधिक है, अध्यक्ष के अनुमोदन से की जाएगी बशर्ते कि भारत सरकार की स्वीकृति निदेशक के पद पर नियुक्ति के लिए दी गई हो।
      • उन पदों के वेतनमान, भत्ते और उनकी पुनरावृत्ति के ग्रहण हेतु भारत सरकार के अनुमोदन की आवश्यकता होगी जो भारत सरकार द्वारा समय-समय पर जारी किए गए आदेशों के अनुसार पदों के समान नहीं हैं।
    • संस्था की निधि को प्राप्त करना और सुरक्षित रखना और संस्था की सम्पत्तियों का प्रबन्धन करना;
    • अनुमोदित बजट के प्रावधानों के अनुकूल व्यय करना;
    • छात्रवृत्ति फेलोशिप, प्रतिनियुक्ति, सलाह मशविरा, अनुदान शोध योजना और परियोजनाओं के संबंध में शर्तें और पांवदिया निर्धारित करना;
    • संस्था के मामलों से प्रबन्धन और प्रशासन से संबंधित लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के उद्देश्य के नियमितीकरण के लिए उपनियमों को बनाना, ग्रहण करना और समय-समय पर परिवर्तित करना ;
    • संस्था के कर्मचारियों के ऊपर निलम्बन और बरखास्तगी की शक्तियों सहित नियंत्रण करना;
    • संस्था के निदेशक की शक्तियाँ, कार्य और कर्त्तव्य निर्धारित करना;
    • समय-समय पर उन विषयों को चुनना जिनमें संस्था द्वारा अध्ययन, शोध, प्रशिक्षण और शिक्षण प्रदान किया जा सकें;
    • विदेशी अध्येताओं (स्कालरों) संस्थाओं और संगठनों से पत्राचार करना उनसे संस्था के कार्य से संबंधित मामलों में सहयोग करना;
    • यदि वह उचित समझे तो वह संस्था का भारत में और विदेशों में प्रतिनिधित्व करने के लिए प्रतिनियुक्ति कर सकती है;
    • व्याख्यान और सेमिनार करना और ऐसे विषयों पर और ऐसे ढंग से जो वह समय-समय पर उचित समझे, प्रशिक्षणों, शोधों और सम्मेलनों की व्यवस्था करना;
    • वह समय-समय पर जो उचित समझे, उन अध्ययनों, पुस्तकों, पत्रिकाओं रिपोर्टो और/अथवा अन्य साहित्यों का प्रकाशन करना अथवा वित्तीय सहायता देना और उन्हें विक्रय करना अथवा विक्रय हेतु व्यवस्था करना;
    • जिसे वह समय-समय पर उचित समझे , विधिक और संबंधित क्षेत्रों में ऐसी सामग्रियों के दस्तावेजीकरण के लिए व्यवस्था करना स्थापित करना एवं बनाए रखना ;
    • पुस्तकालय अथवा पुस्तकालयों को स्थापित करना एवं बनाए रखना;
    • और इनके संचालन के लिए जो आवश्यक हो ऐसी सामग्रियों और पदार्थों को क्रय करना।.
  3. प्रबन्धन कौंसिल अपने संकल्पों द्वारा जो आवश्यक और उचित समझे ऐसी प्रबन्धकीय, वित्तीय और अन्य शक्तियाँ निदेशक को अथवा अन्य किसी अधिकारी को सौंप सकती है।
17. (A) प्रबन्ध कौंसिल की बैठकें :
प्रबंध कौंसिल संस्था के सुचारू रूप से चलने के लिए जो भी आवश्यक हो उन अंतरालों पर बैठक करेगी।
(B) बैठकों का अध्यक्ष:
प्रबंध कौंसिल के साथ-साथ साधारण सभा की सभी बैठकों की अध्यक्षता अध्यक्ष करेगा लेकिन जहाँ अध्यक्ष किसी बैठक में अनुपस्थित हो तो भारत के सर्वोच्य न्यायालय का वरिष्ठ अवर न्यायाधीश अध्यक्षता करेगा जो संस्था का सदस्य है। उन दोनों की अनुपस्थिति में उपस्थित सदस्य अपने बीच से किसी एक को अध्यक्षता करने के लिए चुन सकते हैं।
18. निदेशक:
  1. संस्था का निदेशक प्रमुख कार्यकारी अधिकारी होगा वह भारत सरकार से अनुमोदन के अध्यक्ष द्वारा नियुक्त किया जाएगा और ऐसा वेतन और परिलब्धियाँ पायेगा और ऐसी शर्तों और बन्धनों से शासित होगा जैसा कि भारत सरकार के अनुमोदन से अध्यक्ष द्वारा समय-समय पर निर्धारित की जाऐंगी।
  2. निदेशक संस्था की ओर से संस्था के उपनियमों के अनुसार समझौता/अनुबंध करने के लिए अधिकृत है।
19. निदेशक का कार्य एवं कर्त्तव्य :
  1. उस आदेश के अधीन जो अध्यक्ष द्वारा पारित किया जा सकता है, निदेशक निम्नलिखित कार्यों के लिए उत्तरदायी होगा :
    • संस्था के मामलों और निधि के उचित प्रशासन में;
    • संस्था के सभी कर्मचारियों के कर्त्तव्य निर्धारित करना;
    • वार्षिक बजट, पूरक बजट इत्यादि और सक्षम प्राधिकरण के समक्ष उनके अनुमोदनार्थ प्रस्तुत करना;
    • लेखा संधारण और उनका लेखा परीक्षण;
    • संस्था की सभी गतिविधियों और संस्था के कर्मचारियों के काम और आचरण पर सामान्य पर्यवेक्षण करना और संयोजन करना।
  2. निदेशक प्रबंध कौंसिल, साधारण सभा , समितियों , उपसमितियों आदि की बैठकों की कार्यवाही का अभिलेख (रिकार्ड) रखेगा और अन्य ऐसे कार्य करेगा जो समय-समय पर अध्यक्ष द्वारा सौंपे जाऐंगे।
  3. निदेशक संस्था की वार्षिक रिपोर्ट और लेखे प्रबंध कौंसिल/साधारण सभा के विचारार्थ तैयार करेगा।
  4. निदेशक अध्यक्ष के अनुमोदन से अपने ऐसी शक्तियाँ जिसे वह आवश्यक समझता हो, संस्था के किसी अधिकारी को लिखित में सौंप सकता है।
  5. दीर्घ अवकाश अथवा उसके काम करने का असमर्थता के कारण , निदेशक की अनुपस्थिति में अध्यक्ष कार्यों को सम्पन्न करने के लिए अंतरिम व्यवस्था कर सकता है।
20. संस्था का कोष, लेखे और लेखा-परीक्षण :
  1. संस्था के कोष में निम्नलिखित सम्मिलित होंगे:
    • केन्द्रीय सरकार अथवा राज्य सरकार द्वारा प्रदत्त अनुदान;
    • अन्य स्रोतों से दान एवं योगदान;
    • संस्था द्वारा संचालित पाठ्यक्रमों हेतु एकत्रित शुल्क;
    • संस्था के प्रकाशनों से आय
  2. संस्था बैलेंस शीट सहित अन लेखे-जोखे का हिसाब उस रूप में रखेगा जैसा कि सोसाइटी पंजीयन अधिनियम 1860 और उसके अन्तर्गत निर्मित उपनियमों में निर्धारित है।
  3. संस्था का कोष संस्था के कम्पनी ज्ञापन में उल्लिखित उद्देश्यों के लिए उपयोग में लाया जाएगा।
21. संस्था के लेखे-जोखे का लेखा -परीक्षण संस्था की साधारण सभा द्वारा नियुक्त ऑडिटर द्वारा किया जायेगा और संस्था के लेखे-जोखे के आडिट से संबंधित किया गया व्यय संस्था द्वारा देय होगा।
22. बैंक खाते का संचालन :
संस्था का कोष प्रबंध कौंसिल द्वारा नामित सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक में जमा किया जायेगा। संस्था द्वारा अथवा उसकी ओर से प्राप्त कोई भी राशि संस्था के बैंक खाते में जमा कराई जायेगी और निदेशक अथवा इस संबंध में अधिकृत अन्य अधिकारी/कर्मचारी द्वारा जारी किए गए चैक के अतिरिक्त राशि नहीं निकाली जायेगी।
23. क्षेत्रीय प्रशिक्षण केन्द्र:
संस्था अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए देश के विभिन्न भागों में स्थित अन्य विभिन्न संस्थाओं में उपलब्ध सुविधाओं का उपयोग कर सकेगी।

24. विधिक कार्यवाही :
संस्था निदेशक के नाम पर राष्ट्रीय राजधानी प्रदेश दिल्ली पर लागू सोसाइटी पंजीयन अधिनियम 1860 के अनुच्छेद 6 के अनुसार अभियोजन कर सकती है या उस पर अभियोजन किया जा सकता है।

25. मुआवजा (क्षतिपूर्ति) :
संस्था का प्रत्येक अधिकारी संस्था के कोष से किसी भी वास्तविक कार्यालयीन कर्त्तव्य के निष्पादन में हुए संस्था के विरूद्ध व्यय या हानि की क्षतिपूर्ति के लिए क्षतिपूरित किया जायेगा।

26. अधिनियम की वैधता :
संस्था अपने अंग में किसी रिक्तता के बावजूद भी कार्य करेगी और संस्था का कोई कार्य, निर्देशक अथवा कार्यवाही इस कारण से अवैध नहीं होगी कि उसके सदस्यों में से किसी की रिक्तता या नियुक्ति की त्रुटि है।
27. प्रबन्ध कौंसिल की वार्षिक सूची :
जैसा कि सोसाइटी पंजीयन अधिनियम 1860 के अनुच्छेद 4 में आवश्यक है, प्रबंध कौंसिल के सदस्यों की सूची वर्ष में एक बार संस्थाओं के पंजीयक (रजिस्ट्रार) को नत्थी की जाएगी।

28. संस्था के स्मृति पत्र या नियमों में संशोधन :
संस्था के स्मृति पत्र या नियमों में कोई भी संशोधन राष्ट्रीय राजधानी प्रदेश दिल्ली के लिए लागू सोसाइटी पंजीयन अधिनियम 1860 के अनुच्छेद 12 एवं 12A के अन्तर्गत होगा।
29. मामलों का विघटन और समायोजन :
यदि संस्था का विघटन होता है तो राष्ट्रीय राजधानी प्रदेश दिल्ली के लिए लागू सोसाइटी पंजीयन अधिनियम 1860 के अनुच्छेद 13 और 14 के अन्तर्गत दिए हुए प्रावधानों के अुनसार विघटित होगी।
30. अधिनियम का प्रयोग :
राष्ट्रीय राजधानी प्रदेश दिल्ली के लिए लागू सोसाइटी पंजीयन अधिनियम 1860 के सारे अनुच्छेदों के सारे प्रावधान संस्था पर लागू होंगे।

31. आवश्यक प्रमाण पत्र :
प्रमाणित किया जाता है कि यह संस्था के नियम एवं विनियमों की सही प्रति है।


एम.एन. वेंकटचलैया           एम.एस.ए. सिद्दीकि                      एस. रत्नावेल पांडियन
    (अध्यक्ष)                        (सदस्य/संयोजक)                    (प्रबन्ध कौंसिल के सदस्य) )